Our earth has always fascinated me by virtue of its perseverence. The way it speaks to all of us with its very subtle nuances. My problem is that humans are the only species who are surely and gradually getting out of sync with this dialogue eg. we don't miss a particular bird, the earthworm, our waters have become brakish even receding. Unfortunate paradox is the dialogue is becoming man vs earth. All other sentient beings, as Dalai Lama says, are being pushed to the margins.
Friday, January 7, 2011
yaadein mere bachpan ki
पर उस दिन हम दोनों कि लाटरी लगनी थी सो लग गयी ! जैसे ही वि.जे हस्पताल कि सड़क क्रॉस कि, कि एक स्कूटर सवार धड़ाम से गिरा, स्लिप होकर ! दाड़ी वाला मुछढ़ ! हम दोनों भागे , उठाओ तो उठे ना ...नीम-बेहोश , दांतों से खून रिस रिस कर दाढ़ी में, जहाँ एक टूटा दांत अटका हुआ था ! हमने उसको , उसके स्कूटर को खींच-खूंच कर सड़क किनारे लगाया ! अचानक मैंने देखा कि सागर मेरी ओर देख रहा है ! मैंने उसकी नज़र "पढ़" ली ! सो ज़ख़्मी मुछढ़ को हस्पताल पहुँचाने से पहले हम उसका बटुआ , चांदी कि मुंदरी (अंगूठी) , रिस्टवाच, बूट "साफ़" चुके थे , वहीँ कोम्पनी बाग़ कि झाड़ियों में छुपा चुके थे !
पास ही हस्पताल का गेट और इमरजेंसी , वहां जमा कराया तो पूछताछ भी हुई ! एक नर्स बीबी हम पर इतनी फ़िदा और लोटपोट, "कितने चंग्गे लड़के ने"! अब तक उस ज़ख़्मी को होश आ चुका था और हम दोनों के होश फाख्ता हो रहे थे कि घड़ी, पर्स का अब पता चला कि अब ! खैर उसने घर का पता बताया , फोन किया गया ! उन दिनों काले काले फोन हुआ करते थे घुमाने वाले !
सागर ने फिर मेरी तरफ देखा ! हमने मिनमिनाते हुए लोटपोट नर्स बीबी को कहा कि हमारा गाँव बहुत दूर है हम को जाना चाहिए , "हाँ पुत्तर , हाँ पुत्तर तुम जाओ , अब ये ठीक हैं, और इनके रिश्तेदार भी आ रहे "!
अब हम दोनों सीधे उन झाड़ियों में लपके ! बटुए में से 86 रूपये निकले ( बहुत ज्यादा रकम सन '67 के हिसाब से ) ! हम दोनों ने रिक्शा लिया , आटा, कडवा तेल सरसों का, चीनी, चा-पत्ती , बेसन, डालडा, चने किंया दालें यानी दो महीनों का राशन खरीदा ! कुछ दिनों के बाद वो चांदी कि मुंदरी भी सतारह रूपये में बेच दी , हम दोनों ने उसदिन दरबार साहेब के पास छकक कर पूरी-छोले और लस्सी खाए, घर भी लेकर आये !
उस शाम दो बातें हुईं, दोनों को देर से आने के लिए मार नहीं पड़ी , इतना राशन देख कर हम दोनों कि माएं हमारी बलाएं लेती नहीं थी थक रही
दूसरी बात कि हम किरण , कविता पिशोरिया कि नंगी टांगें , जांघें नहीं देख सके !
Wednesday, May 12, 2010
जिन्हें नाज़ है हिंद पर वो कहाँ हैं ....
Friday, January 29, 2010
WE NEVER LEARN HERE, DO WE ???
Tell you what all happened out there in the world far n around me all this while...not that you don't know , but out of all that , what touched me, bothered and saddened me.
Let me begin with my favorite line, " I am not a pessimist at all and am a doer... not a preacher, player of words".
okay here I go about what all touched/saddened me all these months :
* the moment man found hint of water on the moon, he hurled a bomb to find out which put
him in bad light viz a viz earth's nearest neighbour our chandamama...we never bomb our
neighbour's home to 'findout' if he/she has anything useful for us. Moon has always been
associated with man's romanticism, lovely stories, poems and the folklore,
* World Bank (WB)announced that it will give us 3 to 6 billion dollars to clean Ganga , which acc- ording to hindoo mythology emanat(ed) out of Lord Shiva's hair .
Now we know that anyone who (WB) gives something like 4, 5 or 6 billion dollars to clean our
shit and sewer, will IMPOSE some conditions or may be 'eyeing' our glaciers (water)
without 'bombing' it, (the way they did in Iraq for its oil).
* I find this funny that WE CONVERT GANGA into a SEWER and WORLD BANK cleans it, I
find this unacceptable too.
* Our water resources/rivers are already so very polluted still we go around 'immersing' P O P
religious idols (moorties), lakhs of them on Durga pooja or Makar Sakranti.
well these were the 'things' that made me sad apart from the fact that on this Diwali ALSO we burnt more crackers than the previous one...WE NEVER LEARN YOU SEE.
(you can visit me on my Facebook also)
Sunday, October 4, 2009
हम लोग ?
और फिर लाखों टन खेत्री , घर घर उगी , फ़ेंक दी गई । काश उसे और उग लेने दिया जाता। कुछ दाने दुनके ही मिल जाते। पता चल जाता की मुठी भर अनाज के दाने कितना पानी मांगते हैं । खेत्री उगने का गणित तो 9 ग्लास तक रहा, यानि एक ग्लास प्रतिदिन यानि करोडों ग्लास पीने का पानी मिटटी मिटटी हो गया ,धर्म विजयी हुआ , हम धन्य हुए .
रामलीलाओं में शूर्पणखा की नाक काटे जाने वाला सीन फिर से तालियाँ लपेट कर ले गया , नाक कटवाने वाले अभिनेता को इस बार भी किसी ने कोई दस, पचास या सौ का नोट नही थमाया । उसकी नाक काटने वाले की तो बल्ले बल्ले होती रही हमेशा की तरह,
देखने में आ रहा है की गली , मोहल्लों, पार्कों के लिए रावण और उनके आजू बाजू वाले अब छोटे छोटे साइज़ में
बिकने लग पड़े हैं.
हाथरस की रामलीला में जब बजरंगबलि जी ने अपनी छाती फाड़ कर दिखाई तो मेड इन चाइना की जगमग लड़ियों में से अपने राम सीता की जोड़ी काफी चकाचौंध व् तालियाँ पैदा कर गयीं , दुश्मन देश को छाती से लगाने की परम्परा है न ।
इस बीच हरियाणा पंजाब वृहित्र उत्तरी भारत में ललनाओं , मुटियारों को पैदा होते ही मार देना "बादस्तूर" जारी है सुनने , जानने में आ रहा है की प्रतिदिन लगभग 11000 कन्या/भ्रूण हत्याएं सुनियोजित "तौर तरीकों " से की जा रही हैं ।
चलो यह भी अच्छा ही है
जिस मुस्लिम जगत पर हम सब हँसते , छीटाकशी करते रहे है की एक एक मुस्लमान चार चार
पत्त्निया रखता है, अब ऐसा वक्त भी देखने वाले हैं जब इधर द्रौपदी युग का सूर्योदय होने को है ।
एक एक ब्याहता के यहाँ तीन तीन चार चार पति ।
लड़किया सचमुच में राज करेंगी और
पुरूष ने सैंकडों वर्षों से उस पर जो ज़ुल्म किए हैं, षडयंत्र रचे हैं उसका खामियाजा सामने आने को है।
(with my apologies to our rivers, rivulets, ponds, lakes and talaabs).
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And amidst all this :
I visited some very fancy (airconditioned) institutions (fancy schools,colleges)
everywhere , everyone gave the same answer to :
which is the most poisonous snake in the world ?
ANACONDA SIR..
POOR BLACK MAMBA and KING COBRA.
and poor teachers who give a damn NOW A DAYS.
Monday, June 22, 2009
Remembering Halina Posviatovska
कितने दिनों से इस कवियित्री की, उसकी कविताओं की याद आ रही थी. पियूष दईया मेरे पुराने मित्र जो आजकल ललित कला अकादमी में संपादक हैं, को भी तंग किया की 'भेजो ना हालीना की कवितायेँ ..." उधर से भी चुप्पी, खैर...
क्यों ढूँढ़ते हैं हम अच्छी कवितायेँ, कहानिया? क्यों जाते हैं सुंदर अजीबोगरीब जगहों , पहाडों पर? कभी किन्ही कुहासों, धुन्दों में खो सा जाने का मन क्यों होता है भला ?
क्यों इन सभी को हम बाहर ढूँढ़ते हैं जबकि मृगकस्तूरी की तरह यह सब हमारे भीतर मौजूद रहते हैं,
यह मेरा कौन सा मन है
जिसे मैं अपना कोई और ही मन मान रही हूँ ?
(मेरी प्रिये कवियित्री की पंक्तियाँ ) ।
चलिए इन बातों से फिर कभी कतरा कतरा भरेंगे ख़ुद को , अभी हालीना की कविता आपके साथ सांझी की जाए :
यह मेरी अन्तिम कविता है
तुम्हारे लिए ,
अब और नही लिखूंगी,
मैंने कहा।
और चिठ्ठी को ticket लगा कर बंद कर दिया ।
अपने उस चौकोर दिल को
पोस्ट बॉक्स में गिरा दिया।
अब लोग
उस पोस्ट बॉक्स के गिर्द अक्सर घूमते
और पूछते रहते हैं :
"क्या कोई चिडिया घुस गई है
पोस्ट बॉक्स के अन्दर ?
क्योंकि उसके पंख लगातार हिल रहे हैं
और लगता है की वो गा रही है "।
( हालीना पोस्विअतोव्सका )
1935-1967